महाराजा पोरस सैनी— वह भारतीय राजा जिसने सिकंदर महान का सामना किया
बहुत प्राचीन काल की बात है। पंजाब की धरती पर, जहाँ आज भारत और पाकिस्तान के प्रदेश स्थित हैं, दो महान नदियाँ—झेलम और चिनाब—अपने प्रवाह से उस भूमि को सींचती थीं। इन्हीं दोनों नदियों के मध्य एक शक्तिशाली भारतीय राजा का राज्य था। उसका नाम था पोरस सैनी, जिसे प्राचीन यूनानी इतिहासकार पोरस सैनी (Poros Saini) के नाम से भी जानते थे।
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| Maharaja Porus Saini: वह भारतीय राजा जिसने सिकंदर महान का सामना किया। |
पोरस सैनी उस प्रदेश का शासक था, जो झेलम नदी, जिसे प्राचीन यूनानी लोग हाइडेस्पीस (Hydaspes) कहते थे, और चिनाब नदी, जिसे वे एसीसीनीज़ (Acesines) कहते थे, के बीच फैला हुआ था।
पोरस सैनी का नाम भारतीय स्रोतों में नहीं मिलता, किंतु यूनानी ऐतिहासिक अभिलेखों में उसका उल्लेख प्रमुखता से हुआ है। उसके शासनकाल की सबसे प्रसिद्ध घटना वह थी, जब 326 ईसा पूर्व में झेलम नदी के तट पर उसका सामना उस समय के महान विजेता सिकंदर महान से हुआ।
यह केवल दो राजाओं का युद्ध नहीं था, बल्कि इतिहास का वह क्षण था जब पंजाब की धरती पर पोरस सैनी ने सिकंदर की विशाल सैन्य शक्ति के सामने अपने राज्य और सम्मान की रक्षा के लिए युद्ध किया।
युद्ध में पोरस सैनी पराजित हुआ, किंतु उसकी वीरता और नेतृत्व ने स्वयं सिकंदर को प्रभावित किया। कहा जाता है कि पोरस सैनी के साहस से प्रभावित होकर सिकंदर ने उसे पुनः उसके क्षेत्र का शासक बना दिया और उसके राज्य की सीमाओं का विस्तार भी किया।
इतिहास के अनुसार, पोरस सैनी की मृत्यु लगभग 321 से 315 ईसा पूर्व के बीच हुई।
स्रोत और ऐतिहासिक संदर्भ:
पोरस सैनी की कथा हमें मुख्य रूप से यूनानी इतिहासकारों के लेखों से प्राप्त होती है। एरियन (Arrian), डियोडोरस सिकुलस (Diodorus Siculus) और क्विंटस कर्टियस रूफस (Quintus Curtius Rufus) जैसे इतिहासकारों ने पोरस सैनी और सिकंदर के संघर्ष का वर्णन किया है।
भारतीय ऐतिहासिक स्रोतों में पोरस का उल्लेख नहीं मिलता। इसी कारण पोरस सैनी की कहानी का बड़ा भाग विदेशी, विशेषकर यूनानी, ऐतिहासिक विवरणों पर निर्भर करता है।
पोरस की पहचान और उसकी पृष्ठभूमि:
यूनानी इतिहासकार क्विंटस कर्टियस रूफस ने लिखा कि पोरस सैनी की सेना के पास हेराक्लीज़ (Herakles) का ध्वज था। कुछ विद्वानों, जिनमें ईश्वरी प्रसाद भी शामिल हैं, ने इस विवरण को पोरस सैनी के शूरसेन कुल से संबंध के संभावित प्रमाण के रूप में देखा है।
यूनानी स्रोतों, जैसे मेगस्थनीज़, में शूरसेनों को Sourasenoi नाम से वर्णित किया गया है। उनके अनुसार शूरसेन नामक भारतीय जनजाति का संबंध मथुरा और यमुना नदी के आसपास के क्षेत्रों से था।
पोरस सैनी का राज्य और उसका विस्तार:
पोरस सैनी का राज्य नगरों और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध था। उसका विस्तृत प्रदेश झेलम और चिनाब नदियों के मध्य फैला हुआ था।
यूनानी इतिहासकार स्ट्रैबो (Strabo) के अनुसार, पोरस सैनी के राज्य में लगभग 300 नगर थे। इससे उसके राज्य की विशालता और समृद्धि का अनुमान लगाया जाता है।
परंतु पोरस सैनी का शासन केवल समृद्धि तक सीमित नहीं था। उसके आसपास के राज्यों के साथ उसके संघर्ष भी होते रहते थे। इनमें उसका सबसे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी था तक्षशिला का शासक ओम्फिस (Omphis), जिसे अंभी (Ambhi) के नाम से भी जाना जाता है।
कहा जाता है कि पोरस सैनी ने ओम्फिस के पिता अंभीराज (Ambhiraj) की हत्या कर दी थी। इस घटना ने दोनों शासकों के बीच पहले से मौजूद विरोध को और भी गहरा कर दिया।
फिर समय ने करवट ली।
जब सिकंदर अपनी पूर्व दिशा की विजय यात्रा करते हुए इस क्षेत्र में पहुँचा, तब तक्षशिला के शासक ओम्फिस ने उसका स्वागत किया। उसने सिकंदर की विशाल सैन्य शक्ति का उपयोग पोरस सैनी के विरुद्ध करने का अवसर देखा।
इसी समय एक अन्य स्थानीय शासक अबिसारेस (Abisares) ने सिकंदर के सामने समर्पण कर दिया।
लेकिन पोरस सैनी ने ऐसा नहीं किया।
उसने सिकंदर के सामने झुकने से इनकार कर दिया।
और इसी निर्णय ने इतिहास की एक महान युद्धगाथा को जन्म दिया।
हाइडेस्पीस का महान युद्ध:
समय था 326 ईसा पूर्व का।
झेलम नदी के किनारे दो सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं। एक ओर था विश्व-विजय की ओर बढ़ता हुआ सिकंदर, और दूसरी ओर अपने राज्य की रक्षा के लिए खड़ा भारतीय राजा पोरस सैनी।
झेलम की धारा के किनारे होने वाला यह संघर्ष पोरस सैनी के जीवन और सिकंदर के पूर्वी अभियान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण बन गया।
इसी युद्ध को इतिहास में हाइडेस्पीस का युद्ध (Battle of the Hydaspes) कहा गया।
युद्धभूमि का वास्तविक स्थान आज भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। इसी प्रकार दोनों पक्षों की सेनाओं की वास्तविक संख्या भी निश्चित नहीं मानी जा सकती, क्योंकि प्राचीन इतिहासकारों द्वारा दिए गए विवरणों में काफी अंतर पाया जाता है।
फिर भी, इतना निश्चित है कि इस युद्ध ने पोरस सैनी का नाम इतिहास में अमर कर दिया।
एक ओर था सिकंदर—जिसने विशाल भूभागों पर विजय प्राप्त की थी।
दूसरी ओर था पोरस सैनी—जिसने अपने राज्य की सीमा पर खड़े होकर उस महान विजेता का सामना करने का निर्णय लिया था।
और जब युद्ध समाप्त हुआ, तो पोरस सैनी पराजित हुआ, लेकिन उसकी वीरता ऐसी थी कि उसके शत्रु सिकंदर ने भी उसका सम्मान किया।
पोरस सैनी की यही गाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए उस प्राचीन भारतीय राजा की कहानी बन गई, जिसने झेलम और चिनाब के मध्य अपनी धरती पर खड़े होकर सिकंदर महान का सामना किया था।

