हाइडेस्पीस का युद्ध — पोरस सैनी और सिकंदर का महासंग्राम

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 हाइडेस्पीस का युद्ध — पोरस सैनी और सिकंदर का महासंग्राम


प्राचीन काल में पंजाब की धरती पर एक ऐसा युद्ध हुआ, जिसने राजा पोरस सैनी के जीवन और सिकंदर के पूर्वी विजय अभियान की दिशा पर गहरी छाप छोड़ी। यह युद्ध हाइडेस्पीस का युद्ध कहलाया।

युद्धभूमि का वास्तविक स्थान आज भी निश्चित नहीं है। इसी प्रकार दोनों पक्षों की सेनाओं की वास्तविक संख्या भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है, क्योंकि इस युद्ध का वर्णन करने वाले विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में सेनाओं की संख्या को लेकर भिन्न-भिन्न विवरण मिलते हैं।

Porus (on elephant) fighting Alexander the Great, on a "victory coin" of Alexander (minted c. 324–322 BC)
Porus Saini (on elephant) fighting Alexander the Great, on a "victory coin" of Alexander (minted c. 324–322 BC)



* युद्ध से पूर्व की घटना:


सिकंदर जानता था कि झेलम नदी को पार करना सरल नहीं होगा। सामने पोरस सैनी की सेना थी और नदी उसके लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा-रेखा के समान थी।

तब सिकंदर ने अपनी बुद्धि, रणनीति और गुप्त चाल का सहारा लिया।

उसने अपनी सेना के एक बड़े भाग को वहीं पीछे छोड़ दिया, ताकि पोरस सैनी को यह भ्रम बना रहे कि सिकंदर की मुख्य सेना उसी स्थान पर नदी पार करने का प्रयास करेगी।

परंतु अंधेरी और तूफानी रात में सिकंदर ने अपनी छोटी सेना के एक भाग को लेकर एक दूसरे स्थान से झेलम नदी पार करने का निर्णय लिया।

रात का अंधकार था, आकाश में तूफान था और नदी अपने वेग से बह रही थी। इसी परिस्थिति का लाभ उठाते हुए सिकंदर ने अपने सैनिकों के साथ नदी पार कर ली।

जब पोरस सैनी के पुत्र को सिकंदर की इस चाल का समाचार मिला, तो उसने सिकंदर की सेना को रोकने का प्रयास किया।

दोनों पक्षों के बीच प्रारंभिक संघर्ष हुआ।

लेकिन इस पहली मुठभेड़ में पोरस सैनी का पुत्र पराजित हो गया।

अब सिकंदर की सेना झेलम के उस पार पहुँच चुकी थी और महान युद्ध की भूमिका तैयार हो चुकी थी।

* महान युद्ध:


जब पोरस सैनी को सिकंदर की वास्तविक स्थिति का पता चला, तो उसने अपनी सेना को युद्ध के लिए व्यवस्थित किया।

पोरस सैनी ने अत्यंत रणनीतिक ढंग से अपनी सेना को युद्धभूमि में तैनात किया।

उसकी सेना की अग्रिम पंक्ति में युद्ध हाथियों को रखा गया। हाथियों के दोनों ओर पैदल सैनिक और घुड़सवार सेना तैनात की गई।

पोरस सैनी का उद्देश्य स्पष्ट था—हाथियों की शक्ति से शत्रु की अग्रिम पंक्ति को भयभीत करना और उसके बाद पैदल सेना तथा घुड़सवार सेना के माध्यम से आक्रमण को आगे बढ़ाना।

लेकिन युद्धभूमि पर सिकंदर की रणनीतिक कुशलता धीरे-धीरे पोरस की सेना पर भारी पड़ने लगी।

सिकंदर की घुड़सवार सेना ने पोरस सैनी की सेना के दोनों किनारों को निशाना बनाया।

घुड़सवारों के लगातार आक्रमण से पोरस सैनी की सेना की व्यवस्था बिगड़ने लगी और उसके सैनिकों की पंक्तियों में अव्यवस्था फैलने लगी।

पोरस सैनी की सेना के लिए जो हाथी युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति माने जा रहे थे, वही धीरे-धीरे संकट का कारण बनने लगे।

युद्ध की भीषणता और चारों ओर मचे संघर्ष के बीच हाथी घबरा उठे। उनके बेकाबू होने से पोरस सैनी की अपनी ही सेना की पंक्तियों में भ्रम और अराजकता फैलने लगी।

सिकंदर की यूनानी सेना ने अपनी बेहतर युद्ध-रणनीति और हथियारों का उपयोग करते हुए पोरस की सेना को चारों ओर से घेरना आरंभ कर दिया।

युद्ध धीरे-धीरे निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया।

अंततः सिकंदर की सेना ने विजय प्राप्त की।

लेकिन पोरस सैनी ने युद्धभूमि में हार स्वीकार करने के बाद भी तुरंत आत्मसमर्पण नहीं किया।

उसने भारी क्षति सहने के बावजूद युद्ध जारी रखा।

वह तब तक लड़ता रहा, जब तक कि वह स्वयं घायल होकर शत्रु के हाथों बंदी नहीं बना लिया गया।

* युद्ध के बाद सिकंदर का निर्णय:


पोरस सैनी युद्ध में पराजित हो चुका था।

वह घायल था और सिकंदर के सामने बंदी के रूप में खड़ा था।

लेकिन युद्धभूमि पर पोरस ने जिस साहस और वीरता का परिचय दिया था, उसने सिकंदर को प्रभावित किया।

सिकंदर ने पोरस सैनी को उसके राज्य से हटाने के बजाय उसे पुनः उसके क्षेत्र का शासक बना दिया।

इतना ही नहीं, सिकंदर ने उसके राज्य का विस्तार भी किया। उसने पोरस सैनी को दक्षिण-पूर्व की ओर स्थित कुछ प्रदेशों पर भी अधिकार प्रदान किया, जिनमें वे क्षेत्र भी शामिल थे जो पहले ग्लॉसियस (Glausaes) के शासन में थे।

सिकंदर का यह निर्णय केवल सम्मान का विषय नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक राजनीतिक और रणनीतिक उद्देश्य भी था।

वह चाहता था कि स्थानीय शासकों के माध्यम से उस क्षेत्र में उसकी सत्ता के प्रति निष्ठा और स्थिरता बनी रहे।

इस प्रकार जिस पोरस सैनी ने युद्धभूमि में सिकंदर का सामना किया था, वही युद्ध के बाद सिकंदर के साम्राज्य की क्षेत्रीय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थानीय शासक के रूप में बना रहा।

इतिहास में उसके विषय में कहा गया है—

“पराजित होने के बावजूद पोरस सैनी ने अपनी वीरता और सैन्य कुशलता से सिकंदर को प्रभावित किया।”

सिकंदर के साथ पोरस सैनी की आगे की भूमिका:


हाइडेस्पीस के युद्ध के बाद पोरस सैनी ने सिकंदर के आगामी अभियानों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जब सिकंदर की सेना ने संगाला (Sangala) नामक नगर की ओर अभियान किया, तब उस नगर ने सिकंदर की सेना का विरोध किया।

इस संघर्ष में पोरस सैनी ने सिकंदर को सैनिक और अन्य प्रकार का सहयोग प्रदान किया।

अंततः संगाला पर विजय प्राप्त हुई।

विजय के बाद पोरस सैनी को उस क्षेत्र में अपने सैनिकों की छावनियाँ अर्थात् गैरिसन स्थापित करने की अनुमति दी गई।

इस प्रकार युद्ध में पराजित होने के बाद भी पोरस सैनी सिकंदर के आगे के अभियानों में एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में दिखाई देता है।

* पोरस सैनी के जीवन के अंतिम वर्ष:


समय बीतता गया।

फिर वह वर्ष आया जब इतिहास ने एक और बड़ा परिवर्तन देखा।

323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु हो गई।

सिकंदर की मृत्यु के बाद उसका विशाल साम्राज्य उसके सेनापतियों के बीच विभाजित होने लगा।

अब उन सेनापतियों के बीच सत्ता और अधिकार के लिए संघर्ष प्रारंभ हो गया।

इस संघर्षपूर्ण समय में पोरस का भाग्य भी इन राजनीतिक संघर्षों से जुड़ गया।

यूनानी इतिहासकार डियोडोरस के अनुसार, सिकंदर द्वारा नियुक्त एक सात्रप यूडेमस (Eudemus) ने अंततः पोरस सैनी की हत्या कर दी।

पोरस सैनी की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई, इसका पूरा विवरण इतिहास में स्पष्ट नहीं है।

इतिहास में उपलब्ध विवरणों के आधार पर उसकी मृत्यु संभवतः 321 से 315 ईसा पूर्व के बीच हुई।

इस प्रकार झेलम के तट पर सिकंदर का सामना करने वाले उस प्राचीन भारतीय राजा पोरस सैनी की जीवनगाथा इतिहास के पन्नों में समाप्त हुई—एक ऐसी गाथा के रूप में, जिसमें युद्ध, पराजय, साहस, सम्मान, राजनीति और अंततः सत्ता संघर्ष सब एक साथ दिखाई देते हैं।

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