Saini Community History: भागीरथी माली/भागीरथी सैनी कौन होते हैं, क्या है इनका इतिहास?
These people are not Saini: भागीरथी माली मूल रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में पाए जाते हैं। यह लोग शुद्र माली जाति से संबंध रखते हैं। यह लोग अपने आप को मौर्य, कुशवाहा, शाक्य जैसी जातियों से जोड़कर देखते हैं और अपने आप को सूर्यवंशी बोलते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह लोग सैनी जाति के सरनेम का इस्तेमाल करते हैं, अन्य सैनी इन्हें नकली सैनी मानते हैं और आपको बता दें कि शूरसैनी (असली सैनी) अपनी जाति की लड़कियों का विवाह भागीरथी माली से नहीं करते थे।
प्राचीन हिंदू परंपराओं और वंशावली से जुड़ी मान्यताओं में भगवान श्रीराम के वंश की चर्चा विशेष रूप से मिलती है। इस पोस्ट में दशरथ → शत्रुघ्न → शत्रुघाती → दासी माता भागीरथी → भागीरथी माली के रूप में प्रस्तुत वंश-क्रम को दर्शाया गया है। भागीरथी माली के समाज के कई लोग इस कथा पर विश्वास करते हैं और अपना परिचय सूर्यवंशी भागीरथी के रूप में देते हैं ।
भागीरथी माली का मूल कार्य सब्जी की खेती करना और फूलों की खेती करना है। इन्हें प्राचीन काल में "फूल माली" भी कहा जाता था। आपको बता दें कि 1937 में जब राजस्थान के जोधपुर के "सैनिक क्षत्रीय माली" ठाकुरों ने सैनी जाति का नाम इस्तेमाल करना चालू किया, तब भागीरथी माली ने भी सैनी जाति का नाम इस्तेमाल करना चालू कर दिया था।
इनका विवाद उत्तर प्रदेश के राजपूत (ठाकुर) समाज से है। यह नकली सैनी राजा सागर, राजा हरिश्चंद्र और राजा भगीरथ को अपना बोलते हैं, जिस वजह से इनका विवाद ठाकुर समाज से रहता है। क्षत्रिय ठाकुर समाज इनका विरोध वक्त-वक्त पर करता रहता है और इन्हें राजा भागीरथ और राजा सागर की मूर्ति इनके गांवों में लगाने नहीं देता है। क्षत्रिय ठाकुर समाज का कहना है कि नकली सैनी ठाकुर समाज के राजा महाराजाओं का इतिहास चोरी कर रहे हैं। जिस वजह से ठाकुर समाज पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नकली सैनीयो का विरोध करता है।
ठाकुर समाज का यह कहना है कि भागीरथी माली "महात्मा ज्योतिबा फुले" को अपनी जाति का महापुरुष बोलते हैं और अपने आप को सैनी जाति का बोलते हैं, पर महात्मा ज्योतिबा फुले तो माली जाती से संबंध रखते हैं तो भागीरथी माली सैनी कैसे हो सकते हैं।
भागीरथी माली का इतिहास :
भारत के बड़े इतिहासकार मानते हैं कि भागीरथी माली प्राचीन जाति हैं। इस जातियों के लोग मूल रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं। भागीरथी जाति के लोगों को सगरवंशी भी कहा जाता था और इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि इस जातियों का संबंध राजा सागर और राजा भगीरथ से है, जो कि सगरवंशी है। मां गंगा को धरती पर लाने वाले राजा भगीरथ के वंशजों को भागीरथी माली कहा जाता है। यह जाति ठाकुर क्षत्रिय जाति की उपजातियां हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भागीरथी माली 1985 से पहले अपने आप को माली कहते थे। इनके गांव और कस्बों को "मालीवाडा" के नाम से भी जाना जाता था। उत्तर प्रदेश सरकार ने भागीरथी लोगों को अलग-अलग श्रेणी में रखती थी, पर जब यह लोग अपने आप को माली कहने लगे तो इन्हें माली जाति की श्रेणी में ही रखा गया था। बाद में यह लोग अपने आप को सैनी जाति से जोड़ने लगे और आज यह लोग अपने आप को सैनी जाति का हिस्सा मानते हैं।
वर्तमान में भागीरथी अपने आप को सूर्यवंशी बोलते हैं और यह मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और माली जाति से अपना संबंध बताते हैं। भागीरथी अपने आप को मौर्यवंशी भी मानने लगे हैं। भागीरथी अपने आप को बुद्ध धर्म से जोड़कर देखते हैं।
भागीरथी वक्त-वक्त पर अपना सरनेम बदलते रहे हैं। पहले माली, फिर भागीरथी, फिर सैनी और अब मौर्य, कुशवाहा, शाक्य आदि... इन्हें भारत सरकार ने बैकवर्ड समाज (OBC) की श्रेणी में रखा है।


